सबरीमाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- धार्मिक प्रथाओं की अनिवार्यता तय करना अदालतों के लिए कठिन
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि धार्मिक प्रथाओं की अनिवार्यता तय करना न्यायपालिका के लिए कठिन चुनौती है। शीर्ष अदालत के अनुसार, आस्था भावनाओं से जुड़ी है और संविधान में अनिवार्य शब्द का जिक्र तक नहीं है। अदालत ने साफ-साफ कहा कि सामाजिक सुधार और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर ही तय किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट – फोटो :
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को धार्मिक प्रथाओं की अनिवार्यता पर बड़ी टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसके लिए मानक निर्धारित करना अदालतों के लिए असंभव नहीं तो बहुत कठिन जरूर है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि यदि हिंदू संप्रदाय कुछ विशिष्ट प्रथाओं का पालन करता है, तो उन सभी को तब तक अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता, जब तक वे नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हों। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी भी धर्म के विशेष वर्ग की धार्मिक प्रथाओं को तब तक संरक्षण प्राप्त है जब तक वे नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और स्वास्थ्य के विरुद्ध न हों।
संविधान में अनिवार्य शब्द का उल्लेख नहीं- सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्न बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमालिया बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ-साफ कहा कि अनिवार्य शब्द का उल्लेख भारतीय संविधान में कहीं भी नहीं किया गया है।
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धर्म भावनाओं को आकर्षित करता है-अधिवक्ता राकेश द्विवेदी
मामले में हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि किसी धर्म को केवल एक संप्रदाय के सिद्धांतों के मार्फत परिभाषित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में निश्चित रूप से वह शामिल होगा जो विश्वासी स्वयं के लिए तय करते हैं। द्विवेदी ने सबरीमाला मामले में 2018 के बहुमत के फैसले पर कहा, ‘वे कैसे और कब पूजा करते हैं, यह सब विश्वासियों को तय करना है। कृपया इसमें कोई नए विचार न लाएं या पुराने को नए से न बदलें। इसे भविष्य में समस्या पैदा करने वाले उपकरण के रूप में उपयोग न करें।’
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वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत से आग्रह किया कि धर्म भावनाओं को आकर्षित करता है, इसलिए न्यायिक समीक्षा करते समय अदालतों को बहुत धीमी गति से नरम रुख के साथ काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक धर्म के नाम पर कोई धोखाधड़ी या गलत इरादा साबित न हो, अदालत को धार्मिक प्रथाओं के सवाल में जाने से बचना चाहिए।
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हिंदू समाज को एकजुट होने की जरूरत- न्यायमूर्ति नागरत्ना
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि हिंदू समाज को स्वयं को एकीकृत करना होगा। उन्होंने टिप्पणी की, ‘आप यह नहीं कह सकते कि हम एक संप्रदाय हैं और वे दूसरे संप्रदाय के हैं, इसलिए वे एक मंदिर में नहीं आ सकते। यह हिंदू समाज का विचार नहीं हो सकता। यदि हिंदू संप्रदाय दूसरों के लिए अपने दरवाजे नहीं खोलते हैं, तो उन्हें नुकसान होगा।’
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अनुच्छेद 25(2)(बी) के बारे में बताया जो राज्य को सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान 1950 के दशक में इसलिए लाया गया था, क्योंकि उस समय समाज में बहिष्कार जैसी बुराइयां प्रचलित थीं।
पीठ ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर राज्य कब हस्तक्षेप कर सकता है, इसके लिए कोई दिशानिर्देश तय करना मुश्किल है। यह प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘राज्य लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है और यदि लोग सामाजिक बुराइयों में सुधार चाहते हैं, तो उस शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन हमारे लिए भविष्य के मार्गदर्शक सिद्धांत तय करना कठिन है।’विज्ञापन
